मुझे ऐ जिस्म तेरी मेज़बानी याद आएगी
कभी याद आएगा वो कहकशाँ होता हुआ लम्हा
कभी उनके बदन की बेक़रानी याद आएगी
मैं वो किरदार हूँ जो अपनी हस्ती पर ही हावी है
कहानी ख़त्म होगी तो कहानी याद आएगी
बगूलों की तरह फिरता रहूंगा तेरे सहरा में
कभी तो तुझको मेरी क़द्र दानी याद आएगी
मनाएंगे सहर का जश्न कितनी देर हम शबज़ाद
चुभेगी धूप तो वो रातरानी याद आएगी
वो चुप लम्हा की जब उसका बदन मुझसे मुख़ातिब था !
मुझे ताउम्र अपनी बेज़बानी याद आएगी
Vah vahh
ReplyDeleteBahut Shukria... saath banaye rakhiye
DeleteBehatreen :)
ReplyDeleteThank you Vatsal ji :)
Delete