मर गए लोग बला से उसकी
देखो किस तौर संवर जाता है
मुझसा सहरा भी घटा से उसकी
यार हम ख़ाकबसर ख़ाकनशीं
इस फ़ज़ा में हैं हवा से उसकी
अब कोई सुब्ह जगायेगी क्या
हमको उठना है सदा से उसकी
लौट जायेगी बहार उसके साथ
सब्ज़ मौसम है फ़ज़ा से उसकी
ज़िक्र करते हैं कज़ा से उसका
हम जो जीते है दवा से उसकी
आसमाँ ख़ुद को समझता है बहुत
आमद अब होगी ख़ला से उसकी
भेजो खुशबू का ज़रा सा झोंका
इतना कह देना रिदा से उसकी
उसका इंकार हो जाँ दे देंगे
हम की ज़िंदा है रज़ा से उसकी
ज़ख्म के फूल खिले हैं तन में
लहलहाता हूँ हवा से उसकी
दिनेश नायडू
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